Sunday, December 22, 2013

:शैल : सफ़र में रहा

           
तमाम  उम्र  जिसके  घर  में  रहा  इक  अजनबी  की तरह  
वो चला  तो  चलता  ही  रहा  सफ़र  में हमसफर की तरह 

मैं  ढूंढता  फिरता  रहा,  दर- दर भटका, कहाँ -कहाँ न गया
धड़कता  रहा   वही शख्स   दिल  में  राहे - रहबर की तरह 


सफ़र  भी  ऐसा  कि  तमाम,  उम्र , यूँ  ही  सफ़र  में  गुज़रा  
वो  रहा  भी  जिंदगी में  ता - सफ़र शाखे - शज़र  की तरह 


न खत्म हो सके सिलसिले, न खिल सके सिलसिलों के फूल   
वो चला तो चलता   ही  रहा  तमाम उम्र  इक  डगर की तरह 


जिंदगी यूँ  ही गुज़र गई, कभी सुबह तो कभी शाम की तरह   
और वो भटकता ही रहा, कभी अगर तो कभी मगर की तरह 


दोस्तों,आओ करीब और करीब दो कदम  साथ चल कर देखो  
अगर- मगर  में  न रहो,  चलो, मगर इक हमसफर की तरह 

वो जिस्म  था जो भटका  किया, वो  रूह  थी  जो तड़पा किया  
और वो रहा भी तो ऐसे  जैसे कि  न  इधर  न  उधर  की तरह 


कभी  डगर मिली,  तो  कभी   खो  गई  मंजिल, यूँ  हीं समझो 
वो  तमाम  उम्र  सफ़र में  रहा,  मगर   नूरे - नज़र   की  तरह 

वो चला तो चलता ही रहा,  न  खुदा ही मिला न विसाले सनम
कुछ  न मिल  सका  उसको जो जीता रहा  इक  बहर की तरह


इलज़ाम औरों  के  सर मढ़ दें  ये इक नया  दस्तूर है ज़मानें का 
क्या खाक मिलेगा उसको जो उलझा रहा, अगर-मगर की तरह 

                                                         शालिमा "शैल"